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भतीजी की नशीली चूत की दोबारा चुदाई
एक दिन मैं काम से शहर गया था और दोपहर के समय लौट आया और आकर मैंने अनीता से पूछा- सब घर के लोग कहाँ गए हैं?
तब उसने कहा- सब लोग खेत में गए हैं।
सुनकर मैं बहुत खुश हुआ।

वह पानी लेकर आई.. पानी पीने के बाद मैंने बिना कुछ कहे अपनी बाँहें फैला दीं.. वह मेरे सीने से आकर लिपट गई।
एक अल्हड़ गदराया माल मेरे आगोश में सिमटा हुआ था, मैं उसकी पीठ सहलाने लगा।

मैं धीरे से पलंग पर बैठ गया। मैंने उसके पतले होंठों पर अपने होंठ रख दिए, उसके रसीले अधरों का शहद चूसने लगा।
शायद उसकी चूत भी मेरे लंड का इंतजार कर रही थी।

मैंने उसे जाँघों पर बिठाया और उसके सीने पर टिके हुए उसके बड़े-बड़े सेब मेरे हाथों में आ गए थे। मैंने जोर से उसके मस्त संतरों को दबाया।

‘आाहहह..’ करके उसने मेरे होंठों से अपने होंठ मिला दिए, मैं मस्ती से उसके बड़े-बड़े गोले दबा रहा था।
आज उसने शर्ट और स्कर्ट पहना हुआ था। वो बहुत सुन्दर लग रही थी। मेरी भतीजी कली थी.. लेकिन मैं उसे फूल बना चुका था।
आज चूत की खुजली के चलते ये मासूम सी कली मेरा साथ दे रही थी।

उसने कहा- काका पहले खाना खा लो..
मैंने लौड़ा उठाते हुए कहा- अनीता जान, पहले इसकी भूख मिटानी है।

वह मेरी जाँघों पर बैठी थी.. उसके बड़े-बड़े चूतड़ों के नीचे मेरा लंड दबा हुआ था।

मैंने उसका स्कर्ट ऊपर उठाया उसकी भरी हुई रान.. चिकना बदन.. उसकी जाँघों में मैंने हाथ घुसाया। उसकी जाँघों की नरमाहट क्या खूब थी।
तब वह बोली- काका दरवाजा खुला ही रखोगे क्या?
तब मैंने उसे कहा- चल जल्दी से बंद कर आ।

वह उठी अपने चूतड़ों को मटकाती हुई गई.. दरवाजा बंद करके वापस आ गई।
मैं अपने कपड़े उतारने लगा.. मैं निक्कर में था.. वह आकर मुझे लिपट गई। वह भी गरम हो गई थी़। तब मैं उसके बड़े-बड़े कूल्हों को दबाने लगा।

मैंने उसे पलंग पर लिटाया उसकी स्कर्ट का हुक खोलने लगा और धीरे से नीचे को खिसका दिया। उसने खुद भी स्कर्ट हो हटाने के लिए अपने चूतड़ों को उचका लिया। उसकी चिकनी जाँघें.. भरा हुआ मांसल जिस्म.. उसकी चूत पर छोटी सी सफेद चड्डी.. वह भी एकदम कसी हुई.. आह्ह.. कितना हसीन माल मेरी बांहों में था, उसकी चिकनी जाँघों पर मैंने होंठ रख दिए!
आह्ह.. उहहह..’ उसकी सिसकी निकल गई। उसके शरीर की मदहोश करने वाली खुश्बू आ रही थी.. जैसे उसकी रानों तथा जांघ पर जीभ रखी.. वो उत्तेजनावश चिल्ला उठी- आह्ह.. उईइइउऊउ.. काकाआ… आईइ..

मैंने उसकी शर्ट को ऊपर उठाया उसकी गहरी नाभि पर हाथ घुमाया.. उसके आगे के बटन खोल दिए।
आह्ह.. मेरा लंड हिचकोले मार रहा था नादान और सुडौल माल देखकर..
मैंने झट से अपनी निक्कर निकाली.. मेरा काला लंड आगे से घुमावदार सुपारा हवा में लहराता हुआ चूत को लीलने तैयार हो उठा था।

उसके बॉल दबाता हुआ उसकी चड्डी के ऊपर मैंने जीभ रख दी, उसकी सिसकी निकली- ऊ..माँ.. मम्मी.. आआईईउ..
उसकी चूत का हिस्सा पूरी तरह फूला हुआ था।
उसने कहा- काका अब बस करो अब चोद दो..।

तब मैंने उसकी कसी हुई चड्डी निकाल दी, अब उसकी चूत साफ दिख रही थी, चूत पर काले-काले घुंघराले बाल थे।

उसकी चूत के मुहाने पर भी कुछ बाल झाँक रहे थे। उसकी चूत के दोनों होंठ चिपके हुए थे और उससे उसकी टीट मतलब दाना़… चूत से बाहर झाँक रहा था।
अब तक की चूतों में यही एक थी.. जिसका बड़ा दाना है। उसकी चूत की मखमली झांटों की चादर पर मैंने होंठ रख दिए।

वह चिल्लाने लगी- आआआइउ.. काकाहह..

मैं समझ गया कि भतीजी लंड खाने को राजी है। मैंने झट से उसके चूतड़ों के नीचे तकिया लगाया। उसकी चूत बाहर को उभर आई। फिर उसकी चूत के होंठ अलग किए.. लाल होंठ वाली चूत.. रस बरसा रही थी। उसके पैरों के बीचों-बीच अपने घुटने टेके.. हाथों से उसकी चूत के होंठों को अलग किया। अपने लंडबाण पर थूक लगाया.. छेद पर लण्ड सैट करके पूरा सुपारा आराम से घुसाया। उसके दोनों पैरों को छाती से लगाकर जोर से धक्का मारा।

‘मम्मी.. ममममीमी.. आआइ.. काकाहहह.. हनन..’
उसकी चूत को ‘टरटर..’ बजाता हुआ पूरा लवड़ा भतीजी चूत में घुसा दिया।
उसकी सील तो मैंने ही तोड़ी थी और उसके होंठों पर होंठ रखकर उसका रस चूसता हुआ मैं धकापेल चोद रहा था।

मैं बहुत देर तक चोदता रहा.. फिर मैंने लंड रस उसकी नाजुक चूत में डाल दिया।

उसने भी अपनी चूत मेरे नाम कर दी थी और वह अपनी चूत का उद्घाटन करवा के चली गई।

आज वह दो बच्चों की माँ है.. लेकिन आज भी काले गुलाब की तरह सुन्दर है।

यह घटना 2003 की है।


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